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धार्मिक स्वतंत्रता पर मौजूद खतरे संयुक्त राज्य अमेरिका के अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) ने 2015 की रिपोर्ट में भारत को एक बार फिर दोषी ठहराया है। USCIRF एक स्वतंत्र, द्वि-दलीय अमेरिकी संघीय सरकार आयोग है जिसकी स्थापना 1998 में अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत की गई जो कि अमेरिका को छोड़ कर पूरी दुनिया में धर्म की स्वतंत्रता पर नज़र रखता है। यूरोपीय संघ ने भी भारत को धार्मिक स्वतंत्रता के आधार पर "विशेष चिंता वाले देशों" की सूची में डाल दिया है। भारत हाल में जारी इस रिपोर्ट का संज्ञान लेने से इंकार कर सकता है लेकिन यह हमारे देश में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति को देखने काएक अवसर प्रस्तुत करता है। लेकिन इससे पहले कि हम ऐसा करें, अमेरिका को भी आईना दिखाया जाना चाहिए। सीनेट और सशस्त्र सेवाओं के लिए एक पादरी है। सुबह नाश्ते की प्रार्थना नियमित रूप से व्हाइट हाउस में होती है। दिलचस्प बात है, अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट में सार्वजनिक सत्र की घोषणा एक पदाधिकारी द्वारा होती हैः "भगवान!, इस माननीय न्यायालय को बचाना।" विडाल बनाम जिरार्ड (के निष्पादक) में, यू-एस सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि अमेरिका "ईसाई देश" है और अमेरिका बनाम मैसिनटोश में यह माना कि यह "ईसाई लोगों से भराय" है। धर्म की स्वतंत्रता को विश्व स्तर पर एक मौलिक मानव अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त है। इसमें धर्म को अपनाने की स्वतंत्रता, बिना किसी को सताए धर्म परिवर्तन की स्वतंत्रता तथा किसी के धर्म को व्यक्त करने की स्वतंत्रता शामिल है। पिछले कुछ महीनों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किसी भी व्यक्ति द्वारा कोई भी धर्म रखने या अपनाने" को नकारा नहीं गया है, इसे बनाए रखा गया है। लेकिन फिर भी, USCIRF की रिपोर्ट में कुछ सच्चाई है। जून 2014 के बाद से, धार्मिक अल्पसंख्यकों पर सत्तारूढ़ पार्टी के सदस्यों द्वारा अपमानजनक टिप्पणी की शृंखला चल रही है और प्रधानमंत्री ने उनके खिलाफ कोई भी दृश्य कार्रवाई नहीं की है। क्या यह तथ्य नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी ने अपने 2014 के घोषणापत्र में इस प्रकार के धर्म परिवर्तन को प्रतिबंधित करने का वादा किया था? मोदी को उनकी पार्टी तथा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) को यह बताने की आवश्यकता है कि यह धार्मिक स्वतंत्रता पर एक केंद्रीय धर्म परिवर्तन कानून का अतिक्रमण करना होगा तथा अपने "पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता" के वादे का मजाक बनाना होगा। लेकिन हमारे उच्चतम न्यायालय ने भी धर्म की स्वतंत्रता को प्रतिबंधात्मक रूप से लिया है। इसने यह निर्णय दिया कि इस अधिकार के अंतर्गत केवल आवश्यक धार्मिक प्रथाएँ सुरक्षित हैं और क्या "आवश्यक" या परिधीय है, इसका निर्णय अदालत द्वारा किया जाएगा न कि पवित्र ग्रंथों द्वारा। लेकिन यदि न्यायपालिका नीतिगत मामलों पर फैसला करने में सक्षम नहीं है, तो निश्चित रूप से इसके पास धर्म की "आवश्यक" प्रथाओं का निर्णय लेने की शक्ति नहीं होनी चाहिए। अनुच्छेद 25, हर व्यक्ति को उसकी मान्यता के अनुसार अभ्यास करने की स्वतंत्रता की गारंटी के लिए है। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्वीकार किया जब उसने देखा "यह अनुच्छेद प्रतिबंधों के अधीन है, हर व्यक्ति का, हमारे संविधान के तहत अपने धार्मिक विश्वासों का अभ्यास करना एक मौलिक अधिकार है जो कि उसके अपने विवेक या निर्णय के द्वारा अनुमोदित किया जा सकता है।" आवश्यक अभ्यास की जाँच इस मौलिक संवैधानिक सिद्धांत के विपरीत है। इस परीक्षण के अंतर्गत, कोर्ट कानूनी संरक्षण द्वारा कुछ धार्मिक प्रथाओं को दूसरों के ऊपर विशेषाधिकार देता है। यह परीक्षण अनिवार्य रूप से धर्म के ऊपर सवालों के जवाब कोर्ट से पूछता है जिसे करने में यह सक्षम नहीं है। कोर्ट हमेशा धार्मिक सवालों के लिए कानून की निश्चितता लागू करता है, जहाँ सदैव ही मतों का अंतर होता है। सांस्कृतिक प्रथाओं पर निर्णय देने में समस्या यह है कि कोर्ट सदैव ‘हाँ’ या ‘ना’ में जवाब को वरीयता देता है जबकि संस्कृति की प्रवृत्ति व्यक्तिपरक है। यदि सटीक परिभाषा को न देखें तो, धर्म समान है। यह न्यायिक निश्चितता पैदा करने के लिए अनुच्छेद 25 के जनावेश से परे है। धर्म परिवर्तन पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले भी धर्म की स्वतंत्रता को सीमित रखते हैं।

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